भगवान की ससुराल में भी धूमधाम से मनाया जा रहा श्री कृष्ण जन्माष्टमी

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भगवान श्रीकृष्ण ने कुदरकोट (कुंडिनपुर) से ही देवी रूक्मिणी का किया था हरण

बिधूना(औरैया)। भगवान श्रीकृष्ण की ससुराल कहे जाने वाले गांव कुदरकोट (कुंडिनपर) में भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के 5249 लें जन्मोत्सव को भव्य तरीके से मनाने के लिए अलोपा देवी मंदिर पर व्यापक रूप से तैयारियां की जा रही हैं।
उत्तर प्रदेश का औरैया जनपद जहां क्रांतिकारियों की भूमि के नाम से इतिहास में दर्ज है वही पौराणिक धरोहरों के साथ जिले के गांव कुदरकोट (पूर्व में कुंडिनपुर) का नाम भी इतिहास के पन्नो में दर्ज है। मान्यता है कि यहां भगवान श्रीकृष्ण की ससुराल है यहां पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा रुकमिणी के हरण करने के प्रमाण भी मिलते हैं, जिससे यह जगह पौराणिक है।

भागवत पुराण में उल्लेख है कि कुंदनपुर में पांडु नदी पार करके भगवान कृष्ण रुकमिणी का हरण कर ले गए थे और द्वारका ले जाकर विवाह कर उन्हें अपनी रानी बनाया था। इसके अलावा देवी के अदृश्य होने का भी तथ्य भागवत पुराण में मिलता हैै। कुदरकोट में अलोपा देवी का मंदिर भी है। हालांकि भगवान श्रीकृष्ण की ससुराल को लेकर लोगों के अलग-अलग तर्क भी हैं। तर्क है कि कुंडिनपुर जिसका अपभ्रंस कुंदनपुर का नाम बाद में कुदरकोट पड़ा है। भगवान कृष्ण की ससुराल होने के बाद भी आज तक न कुदरकोट का न तो विकास हो सका है और न ही इस स्थल को पौराणिक महत्व मिल सका है।

श्रीमद् भागवत ग्रंथो के उल्लेख के अनुसार लगभग 5 हजार बर्ष पूर्व कुंडिनपुर (मौजूदा कुदरकोट) के राजा भीष्मक धर्म प्रिय राजा थे। उनकी एक पुत्री रुक्मणि व पांच पुत्र रुक्मी, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेस तथा रुक्ममाली थे। रुक्मी की मित्रता शिशुपाल से थी, इसलिये वह अपनी बहिन रुक्मणि का विवाह शिशुपाल से करना चाहता था। जबकि राजा भीष्मक व उनकी पुत्री रुक्मणि की इच्छा भगवान श्रीकृष्ण से विवाह करने की थी। जब राजा भीष्मक की अपने पुत्र रुक्मी के आगे न चली तो उन्होंने रुकमनी का विवाह शिशुपाल से तय कर दिया। रुक्मणि को शिशुपाल के साथ शादी तय होने नागवार गुजरा तो उन्होंने द्वारका नगरी में भगवान कृष्ण के यहाँ एक दूत भेजकर अपने को हरण करने का आग्रह भिजवा दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मणि का संदेश स्वीकार कर लिया और रुक्मणि को द्वारका ले जाकर अपनी रानी बनाने की पूरी तैयारी कर ली।

नदी के रास्ते रथ से रुक्मणि को ले गए कृष्ण :- ग्रंथो के अनुसार कुंदनपुर में एक परम्परा थी कि शादी के एक दिन पहले सभी कुंवारी लड़किया महल में बने गौरी मंदिर में ब्राह्मणियों के साथ पूजा करने जाती थी। परम्परा के अनुसार शादी से एक दिन पूर्व रुक्मणि भी मंदिर में पूजा करने गयी। इसी समय भगवान कृष्ण ने रुक्मणि की इच्छा पर उन्हें अपने साथ कम बहती हुई पांडु नदी में प्रवेश कर हरण करके द्वारका ले गए। इसके बाद खिसियाये शिशुपाल ने राजा जरासन्द की सेना की मदद लेकर राजा भीष्मक से युद्ध किया जिसमें शिशुपाल बुरी तरह पराजित हुआ था।

रुक्मणि के हरण के बाद अलोप हो गयी माँ गौरी :- मान्यता है कि कुंडिनपुर महल से कुछ दूरी पर स्थित गौरी माता मंदिर से रुक्मणि के हरण के बाद देवी गौरी अलोप हो गयी। जिसके बाद वहां पर अलोपा देवी मंदिर की स्थापना की गयी है और अब इसी मंदिर को अलोपा देवी मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर के पश्चिम दिशा में स्थित द्वापर कालीन महाराजा भीष्मक द्वारा स्थापित शिवलिंग है। जहां अब मंदिर बना हुआ है और ये मंदिर अब बाबा भयानक नाथ के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर के पुजारी राम कुमार चौरसिया ने बताया कि यहां पर चैत्र व आषाढ़ माह की नवरात्रि में हर बर्ष मेला का आयोजन होता है। पिछले 118 बर्षो से भब्य रामलीला का आयोजन होता आ रहा है। दशहरा को रावण का बध होता है। माँ अलोपा देवी मंदिर धरती तल से 60 मीटर की ऊंचाई पर खेरे पर बना हुआ है, हर साल फाल्गुनी अमावश्या को चौरासी कोसी परिक्रमा का आयोजन भी होता है।

मुगल शासन में कुंडिनपुर अब बन गया कुदरकोट :- कुंडिनपुर जो बाद में कुंदनपुर के नाम से जाना जाता था पर जब मुगलो का शासन हुआ तभी से इसका नाम कुदरकोट पढ़ गया। आज भी यहां राजा भीष्मक के 50 एकड़ में फैले महल के अवशेष स्पष्ट दिखाई देते है। आज के समय में जहां कुदरकोट में माध्यमिक स्कूल है वहां पर कभी राजा भीष्मक का निवास स्थान होता था और यहां पर रुक्मणि खेला करती थी। मुगलो ने इस नगर पर कब्जे के बाद इसके पूरे इतिहास को तहस नहस करने के लिए भौगोलिक स्थिति बदलने का भरसक प्रयास किया था। लेकिन यहां पर अवशेष व ग्रंथो में कुंडिनपुर का उल्लेख आज भी है। पुरातत्व विभाग की उदासीनता व जागरूकता की कमी के कारण मथुरा बृन्दावन जैसे पूज्य स्थान कुदरकोट को पौराणिक बिश्व प्रख्याति नही मिल सकी। पिछले दो बर्ष पूर्व खेरे के ऊपर एक मकान में निकली सुरंग इसका उदाहरण है। जिसका आज तक कोई पता न चल सका है।

पौराणिक महत्व के बाद भी नहीं दिख रहा विकास – प्रदेश सरकार ने वर्ष 2021 में क्षेत्रीय विधायक के प्रस्ताव पर मुख्यमंत्री पर्यटन संवर्धन योजना के तहत पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व वाले अलोपा देवी मंदिर को सौंदर्यीकरण हेतु चयनित किया था। जिसके लिए 49.65 लाख रुपया भी जारी हुआ था। जिससे सड़क आदि का निर्माण हुआ था। यह धनराशि सौंदर्यीकरण के नाम पर ऊंट के मुंह में जीरा के समान साबित हुई थी।

Ravi pandey
Author: Ravi pandey

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